AI के नियम और समाजमध्यमपाठ 1935 मिनट का पाठ

गलत जानकारी, डीपफेक और चुनाव

AI नकली फ़ोटो, आवाज़ें और वीडियो बनाना सस्ता और आसान बना देता है जो बिल्कुल असली लगते हैं। जांच-पड़ताल की कुछ आदतें आपको, आपके परिवार को और आपके वोट को सुरक्षित रखने में मदद करती हैं।

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60 सेकंड में

गलत जानकारी, डीपफेक और चुनाव

AI नकली फ़ोटो, आवाज़ें और वीडियो बनाना सस्ता और आसान बना देता है जो बिल्कुल असली लगते हैं। जांच-पड़ताल की कुछ आदतें आपको, आपके परिवार को और आपके वोट को सुरक्षित रखने में मदद करती…

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आसान शब्दों में
अब कुछ लोग ऐसा वीडियो बना सकते हैं जिसमें कोई व्यक्ति ऐसी बातें कहता हुआ दिखता है जो उसने कभी कही ही नहीं। इसलिए किसी भी हैरान करने वाले वीडियो पर भरोसा करने या उसे शेयर करने से पहले, आइए जासूस की तरह उसकी जांच करें।
Misinformation वह गलत जानकारी है जो अनजाने में शेयर हो जाती है। Disinformation वह गलत जानकारी है जिसे लोगों को गुमराह करने के लिए जानबूझकर फैलाया जाता है। AI इन दोनों को कई भाषाओं में तेज़ी से और कम खर्चे में तैयार कर सकता है।

AI किस चीज़ को आसान बना देता है

प्रकारयह क्या हैगलत इस्तेमाल का उदाहरण
डीपफेक वीडियोऐसा वीडियो जिसे इस तरह बदला या बनाया गया हो कि कोई व्यक्ति कुछ कहता या करता हुआ दिखाई देकिसी नेता का ऐसा कुछ ऐलान करते दिखना जो उन्होंने कभी कहा ही न हो
वॉइस क्लोनएक नकली आवाज़ जो किसी असली व्यक्ति जैसी सुनाई देती हैकिसी राजनेता की आवाज़ में कॉल आना जिसमें लोगों से वोट न देने को कहा जाए
नकली तस्वीरेंऐसी घटनाओं की असली जैसी दिखने वाली तस्वीरें जो कभी हुई ही नहींकिसी भीड़, झड़प या आपदा की नकली फ़ोटो
बड़े पैमाने पर नकली टेक्स्टAI द्वारा लिखी गई ढेरों पोस्ट या कमेंट्सनकली अकाउंट्स द्वारा किसी दावे को लोकप्रिय दिखाना

जांच-पड़ताल की आदतें

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    रुकें

    गुस्सा, डर या भारी उत्साह जैसी तीव्र भावनाएं इस बात का इशारा हैं कि आपको थोड़ा ठहरना चाहिए।
  2. 2

    सोर्स की जांच करें

    इसे सबसे पहले किसने पोस्ट किया? क्या यह कोई आधिकारिक अकाउंट है या कोई भरोसेमंद न्यूज़ चैनल या वेबसाइट?
  3. 3

    पुष्टि की तलाश करें

    क्या कई भरोसेमंद न्यूज़ सोर्स भी वही बात बता रहे हैं?
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    तस्वीरों की जांच करें

    रिवर्स इमेज सर्च (जैसे Google Lens) का इस्तेमाल करके देखें कि वह तस्वीर पहले कहां दिखाई दी थी।
  5. 5

    फ़ैक्ट-चेकर्स से देखें

    देखें कि क्या पेशेवर फ़ैक्ट-चेकिंग संगठनों ने इसकी पहले ही जांच कर ली है।
  6. 6

    सोच-समझकर शेयर करें

    अगर पक्का न हो, तो फ़ॉरवर्ड न करें। अगर आप कोई सुधार शेयर कर रहे हैं, तो उसके साथ पूरी बात समझाएं।

किसी चीज़ के नकली होने के संकेत

  • होंठों का हिलना जो शब्दों से मेल न खाए, अजीब तरह से पलकें झपकाना या अजीब रोशनी।
  • तस्वीरों में अजीब हाथ, विकृत लिखावट या अजीब बैकग्राउंड।
  • ऐसी आवाज़ जो सपाट लगे, या जिसमें अजीब ठहराव और गलत उच्चारण हों।
  • कोई असली सोर्स न होना, या ऐसा सोर्स जिसके बारे में आपने कभी सुना ही न हो।
  • कोई ऐसा “ब्रेकिंग” दावा जिसकी खबर कोई भी भरोसेमंद न्यूज़ चैनल या वेबसाइट नहीं दे रही है।
सावधान रहें
जैसे-जैसे टूल्स बेहतर हो रहे हैं, इन कमियों को पकड़ना मुश्किल होता जा रहा है। सिर्फ अपनी आँखों पर भरोसा न करें। किसी तकनीकी कमी (ग्लिच) को खोजने से ज़्यादा ज़रूरी है सोर्स की जांच करना और खबर की पुष्टि करना।

चुनाव

भारत के चुनाव आयोग समेत कई चुनाव अधिकारियों ने प्रचार के दौरान AI और डीपफेक के गलत इस्तेमाल को लेकर आगाह किया है। कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के पास भी भ्रामक AI कंटेंट पर लेबल लगाने या उसे हटाने के नियम हैं। वोटिंग से जुड़ी आधिकारिक जानकारी के लिए हमेशा चुनाव आयोग के आधिकारिक चैनलों पर ही भरोसा करें।
कन्फ्यूज़न फैलाता है
  • किसी चौंकाने वाले क्लिप को तुरंत कई ग्रुपों में फ़ॉरवर्ड करना
  • किसी मैसेज पर सिर्फ इसलिए भरोसा कर लेना क्योंकि किसी रिश्तेदार ने भेजा है
  • WhatsApp फ़ॉरवर्ड देखकर वोटिंग की तारीख बदलने पर भरोसा कर लेना
वोट की सुरक्षा करता है
  • पहले भरोसेमंद न्यूज़ और फ़ैक्ट-चेकर्स से जांच करना
  • ग्रुप में विनम्रता से पूछना कि “यह खबर कहाँ से आई?”
  • चुनाव से जुड़ी जानकारी की पुष्टि केवल आधिकारिक सोर्स से करना
असली उदाहरण
रोज़मर्रा का उदाहरण: चुनाव से पहले, अर्जुन के पारिवारिक WhatsApp ग्रुप में एक ऑडियो क्लिप आई जिसमें एक उम्मीदवार किसी समुदाय का अपमान करता हुआ लग रहा था। अर्जुन ने ध्यान दिया कि किसी भी न्यूज़ चैनल ने यह खबर नहीं दी थी। उसने खोजबीन की और पाया कि फ़ैक्ट-चेकर्स ने ऐसे क्लिप को संभावित रूप से नकली बताया था। उसने बड़ी विनम्रता से ग्रुप में फ़ैक्ट-चेक शेयर किया और रिश्तेदारों से इसे आगे फ़ॉरवर्ड करने से पहले सोचने का अनुरोध किया।
इसे आज़माएं: मैसेजिंग ऐप पर हाल ही में आई कोई एक तस्वीर लें। रिवर्स इमेज सर्च का इस्तेमाल करके पता लगाएं कि वह सबसे पहले कहां दिखी थी। आपने जो पाया उसे लिखें और देखें कि आपको मिला कैप्शन मूल संदर्भ से मेल खाता है या नहीं।

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लैब

एक परखी हुई जांच चेकलिस्ट और हल किया गया एक फ़ैक्ट-चेक।

~25 min

समस्या

जांच-पड़ताल की एक आदत बनाएं और उसका इस्तेमाल करें।

  1. संदिग्ध तस्वीरों, वीडियो या वॉइस नोट्स की जांच के लिए एक छह चरणों वाली चेकलिस्ट लिखें।
  2. कोई ऐसा असली वायरल दावा ढूंढें जिसकी जांच किसी पेशेवर फ़ैक्ट-चेकिंग संगठन ने पहले ही कर ली हो।
  3. उस पर अपनी चेकलिस्ट लागू करें और लिखें कि हर चरण में क्या सामने आया।
  4. अपने नतीजे की तुलना फ़ैक्ट-चेकर के निष्कर्ष से करें।
  5. एक छोटा और विनम्र मैसेज लिखें जिसे आप किसी को शर्मिंदा किए बिना झूठे दावे को सुधारने के लिए फ़ैमिली ग्रुप में भेज सकें।

आपका काम तब पूरा होगा जब

कठिन सवाल

उत्तर देखने से पहले ख़ुद जवाब देने की कोशिश करें। अगर आप इनके जवाब दे सकते हैं, तो आप पाठ समझ गए हैं।

Q1“लायर्स डिविडेंड” (झूठे का फायदा) क्या है, और यह क्यों मायने रखता है?दिखाएं

जब लोगों को पता होता है कि डीपफेक जैसी चीज़ें मौजूद हैं, तो किसी असली रिकॉर्डिंग में पकड़े जाने पर भी कोई व्यक्ति झूठा दावा कर सकता है कि वह रिकॉर्डिंग नकली है। इससे गलत काम करने वाले अपनी जवाबदेही से बच निकलते हैं और हर तरह के सबूतों पर शक होने लगता है। इसका मतलब है कि डीपफेक का नुकसान सिर्फ नकली चीज़ों को सच मान लेना ही नहीं है, बल्कि असली चीज़ों को भी झूठा समझना है। जांच-पड़ताल की अच्छी आदतें और भरोसेमंद सोर्स इन दोनों समस्याओं से निपटने में मदद करते हैं।

Q2कोई झूठा दावा उसके सुधार की तुलना में तेज़ी से क्यों फैल सकता है?दिखाएं

झूठे दावे अक्सर चौंकाने वाले और भावनाएं भड़काने वाले होते हैं, जिससे लोग उन्हें तुरंत शेयर कर देते हैं। सुधार बाद में आते हैं, वे उतने रोमांचक नहीं होते और शायद उन सभी लोगों तक नहीं पहुँच पाते जिन्होंने मूल दावा देखा था। लोग अक्सर दावे को याद रखते हैं लेकिन सुधार को भूल जाते हैं। इसीलिए शेयर करने से पहले ही गलत कंटेंट को रोकना इतना ज़रूरी है।

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या AI डिटेक्शन टूल्स पूरी तरह से डीपफेक की पहचान कर सकते हैं?

वे मदद तो कर सकते हैं लेकिन पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं। वे नकली चीज़ों को पकड़ने से चूक सकते हैं और असली कंटेंट को भी गलती से नकली बता सकते हैं। इसलिए सोर्स, संदर्भ की जांच करना और भरोसेमंद माध्यमों से पुष्टि पाना बेहद ज़रूरी बना रहता है।

क्या सभी एडिट किए गए या AI से बने वीडियो नुकसानदेह होते हैं?

नहीं। व्यंग्य (सटायर), फ़िल्मों, शिक्षा और कला में अक्सर खुलकर एडिटिंग और AI का इस्तेमाल किया जाता है। समस्या उस कंटेंट से है जो असली घटनाओं या असली लोगों के बारे में लोगों को धोखा देने के इरादे से बनाया जाता है।

अगर मुझे अपने किसी परिचित का डीपफेक दिखे तो मुझे क्या करना चाहिए?

उसे शेयर न करें। उस प्लेटफॉर्म पर उसकी रिपोर्ट करें, उचित लगे तो उस व्यक्ति को बताएं, और धमकियों या आपत्तिजनक कंटेंट जैसे गंभीर मामलों में पुलिस को या भारत में cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें।

मुझे कैसे पता चलेगा कि कोई फ़ैक्ट-चेकर भरोसेमंद है?

ऐसे संगठनों को देखें जो अपने तरीके समझाते हैं, अपने सोर्स दिखाते हैं, अपनी गलतियों को सुधारते हैं और फंडिंग की जानकारी सार्वजनिक रखते हैं। कई संगठन इंटरनेशनल फ़ैक्ट-चेकिंग नेटवर्क (IFCN) के सिद्धांतों जैसी आचार संहिता का पालन करते हैं।

पाठ का टेस्ट

5 सवाल। पास होने और इस पाठ को पूरा करने के लिए 3 सही होने चाहिए (60%)।

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